4. पाचन तंत्र (Digestive System)पाचन तंत्र के भाग (Parts of Digestive System)1. आहार नाल (Alimentary Canal)2. सम्बद्ध पाचन ग्रंथि (Digestive Gland)पाचन तंत्र के प्रमुख अंगमुख गुहा (Buccal Cavity)लार ग्रंथि (Salivary Gland)दांत (Teeth)ग्रासनली (Oesophagus)आमाशय (पेट) (Stomach)यकृत (Liver) एवं पित्ताशय (Gall Bladder)छोटी आंत (Small Intestine)1. पक्वाशय या ग्रहणी (Duodenum)अग्न्याशय (Pancreas)2. जेजुनम (Jejunum)3. इलियम (Ileum)बड़ी आंत (Large Intestine)पाचन की प्रमुख अवस्थाएं
4. पाचन तंत्र (Digestive System)
- वैसे अंग जो भोजन पचाने में सहायता करते हैं; उन्हें सामूहिक रूप से पाचन तंत्र कहते हैं।
- इसमें जटिल भोजन सरल पदार्थों में टूट जाता है।
- पाचन की क्रिया यांत्रिक एवं रासायनिक विधि द्वारा सम्पन्न होती है।
- मनुष्य का पाचन तंत्र आहार नाल (Alimentary Canal) एवं सहायक ग्रंथियों से मिलकर बना होता है।
पाचन तंत्र के भाग (Parts of Digestive System)
पाचन तंत्र दो भागों में बंटा होता है:
- आहार नाल (Alimentary Canal)
- सम्बद्ध (जुड़ी) पाचक ग्रंथि (Digestive Gland)
1. आहार नाल (Alimentary Canal)
- यह मुख गुहा से प्रारंभ होकर गुदा तक रहता है।
- पाचन के समय भोजन आहार नाल में ही रहता है।
- आहार नाल की लम्बाई लगभग 8-10 मीटर होती है।
- आहार नाल के अंतर्गत मुख गुहा, ग्रासनी, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय तथा गुदा आते हैं।
2. सम्बद्ध पाचन ग्रंथि (Digestive Gland)
- ये ग्रंथियां भोजन को पचाने वाली एंजाइम का निर्माण करती हैं।
- इसके अंतर्गत लार ग्रंथि, यकृत, पित्ताशय तथा अग्न्याशय आते हैं।
- पाचन की क्रिया मुख गुहा से प्रारंभ होती है और पाचन की क्रिया छोटी आंत में पूर्ण हो जाती है।
- बड़ी आंत में जल का अवशोषण होता है।
रूमेन (Rumen):
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- रूमेन घास खाने वाले जंतुओं में पाया जाता है।
- यह सेल्यूलोज के पाचन में सहायता करता है।
- रूमेन प्रथम आमाशय कहलाता है। रूमेन में भोजन का आंशिक पाचन होता है, जिसे जुगाल कहते हैं, परंतु बाद में जंतु इसे छोटे पिंडकों के रूप में पुनः मुख में लाते हैं तथा जिसे वह चबाते रहते हैं।
- इस प्रक्रिया को रोमंथन (जुगाली करना) कहते हैं तथा ऐसे जंतु रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं।
पाचन तंत्र के प्रमुख अंग
मुख गुहा (Buccal Cavity)
- पाचन मुख गुहा से प्रारंभ होता है।
- मुख गुहा एक खाली जगह होता है जिसमें एक जीभ, तीन जोड़ा लार ग्रंथि तथा 32 दांत पाये जाते हैं।
- लार (Saliva) का pH मान 6.2 से 7.6 होता है। इसकी प्रकृति अम्लीय होती है।
लार ग्रंथि (Salivary Gland)
- लार ग्रंथि से प्रतिदिन एक से डेढ़ (1–1½) लीटर लार का स्राव होता है।
- लार ग्रंथि से लाइसोजाइम, टायलिन, डायस्टेज तथा म्यूसीन नामक एंजाइम निकलते हैं। इसमें सर्वाधिक मात्रा में टायलिन निकलता है।
- लाइसोजाइम एंजाइम कीटाणुओं को मार देता है।
- टायलिन तथा डायस्टेज एंजाइम स्टार्च (मंड) को शर्करा (कार्बोहाइड्रेट) में बदल देते हैं।
- म्यूसीन एंजाइम भोजन को चिपचिपा (लसलसा) बना देता है, जिससे उसे निगलने में आसानी होती है। इस चिपचिपे भोजन को बोलस (Bolus) कहते हैं।
- लार ग्रंथि तीन जोड़ी होती हैं, जिसमें सबसे बड़ी लार ग्रंथि पैरोटिड होती है।
- जब पैरोटिड लार ग्रंथि विषाणु द्वारा संक्रमित हो जाती है तो उसमें सूजन आ जाता है, जिसे गलसुआ (Mumps) कहते हैं।
Remark:
- सांप में पैरोटिड ग्रंथि (जहर की थैली) का कार्य करती है।
दांत (Teeth)
- दांतों का अध्ययन Odontology कहलाता है।
- दांत में कैल्शियम सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है।
- दांतों के निर्माण में 85% योगदान कैल्शियम फॉस्फेट [Ca3(PO4)2] का होता है। 10% योगदान CaCO3 तथा शेष भाग कैल्शियम क्लोराइड का होता है।
- दांतों का क्षरण (टूट-फूट) फ्लोरीन के कारण होता है।
- जब हमारे मुख का pH मान 5.5 से कम होता है तो यह दंत अस्थि क्षय का कारण बनता है।
- मानव दांत की दो परतें (Layers) होती हैं: बाहरी परत ‘इनामेल’ कहलाती है, जबकि आंतरिक भाग ‘डेन्टाइन’ कहलाती है।
- मानव शरीर का सबसे कठोर भाग दांत का इनामेल होता है जो कैल्शियम फॉस्फेट का बना होता है। इनामेल दांतों की रक्षा करता है।
दांतों के प्रकार:
- एकबारदन्ती (Monophyodont): वैसे दांत जो जीवन में केवल एक ही बार निकलता है; जैसे- अकल दांत।
- द्विबारदन्ती (Diphyodont): वैसे दांत जो जीवन में दो बार आते हैं; जैसे- दूध के दांत जिनकी संख्या 20 होती है। बच्चों में कुल 20 दांत टूटने के बाद दोबारा निकलते हैं।
मानव के दांत हेटेरोडॉन्ट (Heterodont Teeth) होते हैं:
- कृन्तक (Incisor – I): इसे Nose teeth भी कहते हैं। यह भोजन को काटने के काम में आता है। मानव में इसकी संख्या 4 + 4 = 8 है।
- रदनक (Canine – C): इसे Eye teeth भी कहते हैं। यह भोजन को चीरने-फाड़ने का कार्य करता है। मानव में इसकी संख्या 2 + 2 = 4 है। मांसाहारी जानवरों में Canine अधिक नुकीला होता है।
- अग्र-चवर्णक (Pre-molar – Pm): इसे Cheek Teeth भी कहते हैं। यह भोजन को चबाने का कार्य करता है। वयस्क में इसकी संख्या 4 + 4 = 8 होती है।
- चवर्णक (Molar – m): इसे Wisdom teeth भी कहते हैं। इसका भी कार्य भोजन को चबाना है। वयस्क में इसकी संख्या 6 + 6 = 12 होती है।
Remark:
- बच्चों में Pre-molar का पूर्णतः अभाव होता है तथा IIIrd Molar नहीं पाया जाता है।
- पक्षियों की चोंच दांत का ही रूपांतरित रूप होता है। हाथी का बाहर निकला दांत उसके ऊपरी जबड़े का 2nd Incisor होता है।
ग्रासनली (Oesophagus)
- यह मुखगुहा को आमाशय से जोड़ने का कार्य करता है। यह नली के समान होता है।
- इसमें कोई भी पाचन की क्रिया नहीं होती है।
- ग्रासनली क्रमानुकुंचन प्रक्रिया द्वारा मुखगुहा से आमाशय तक पहुँचाता है।
आमाशय (पेट) (Stomach)
- यह थैलीनुमा आकृति होती है जो भोजन को संग्रहित करने तथा पचाने दोनों का कार्य करती है।
- यह भोजन को लगभग 4 घंटे रोककर रखती है।
- आमाशय के तीन भाग होते हैं– कार्डिएक, फण्डिक तथा पाइलोरिक।
- कार्डिएक: यहाँ से HCl निकलता है जो टायलिन के प्रभाव को समाप्त करता है और कीटाणुओं को मार देता है। यह भोजन को अम्लीय बना देता है।
- फण्डिक: बीच का भाग होता है, जिसमें कांटेनुमा रचना पायी जाती है, जिसे रुजी कहते हैं। यह भोजन को रोककर रखने का कार्य करता है।
- पाइलोरिक: इसमें जठर ग्रंथि पायी जाती है जिससे जठर रस (Gastric Juice) निकलता है। जठर रस में रेनिन तथा पेप्सीन पाया जाता है।
- रेनिन दूध की घुली हुई प्रोटीन कैसीनोजेन को ठोस प्रोटीन कैल्शियम पैराकैसीनेट के रूप में बदल देता है। पेप्सीन प्रोटीन को पचाता है और इसे पेप्टोन में बदल देता है।
- भोजन आमाशय के बाद छोटी आंत में जाता है, तब भोजन काईम (Chyme) का रूप ले चुका होता है।
यकृत (Liver) एवं पित्ताशय (Gall Bladder)
- यकृत (Liver): यह सबसे बड़ी ग्रंथि है। इसका भार लगभग 1.5 kg होता है। यह अपने क्षतिग्रस्त हिस्सों का पुनर्निर्माण स्वयं कर लेती है। यकृत में पित्त (Bile) का निर्माण होता है।
- पित्ताशय (Gall Bladder): इसमें यकृत द्वारा बनाया गया पित्त आकर जमा रहता है। इसमें पित्त का निर्माण नहीं होता है।
- पित्त एंजाइम न होते हुए भी पाचन में सहायक है। पित्त भोजन को क्षारीय बना देता है क्योंकि पित्त क्षारीय होता है (pH मान 7.8-8.5)।
- पित्त भोजन (काईम) में उपस्थित वसा (Fat) को तोड़ देता है, जिस क्रिया को पायसीकरण (Emulsification) कहते हैं।
छोटी आंत (Small Intestine)
- भोजन का पूर्ण पाचन छोटी आंत में होती है।
- छोटी आंत के तीन भाग होते हैं: (1) पक्वाशय (Duodenum) (2) जेजुनम (Jejunum) (3) इलियम (Ileum)।
1. पक्वाशय या ग्रहणी (Duodenum)
- यह छोटी आंत का पहला भाग होता है। आमाशय के बाद भोजन (काईम) ग्रहणी में आता है जहाँ उसमें पित्त मिलती है, वह क्षारीय बन जाता है।
- ग्रहणी में किसी भी प्रकार का एंजाइम नहीं होता है।
- इसमें दो प्रकार के हार्मोन पाये जाते हैं:
- कोलेसिस्टो काइनिन (CCK): यह पित्ताशय के पित्त निकालने के लिए उत्तेजित करता है।
- सिक्रेटीन (Secretin): यह अग्न्याशय को अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) को स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है ताकि भोजन सरलता से पच सके।
अग्न्याशय (Pancreas)
अग्न्याशय से तीन प्रकार के एंजाइम निकलते हैं जिन्हें पूर्ण पाचक रस कहते हैं (Trick: LAT):
- L = लाइपेज (Lipase): यह पित्त द्वारा पायसीकृत (Emulsified) वसा को तोड़कर ग्लिसरोल तथा वसीय अम्ल (Fatty acid) में बदल देता है।
- A = एमाइलेज (Amylase): यह स्टार्च (मंड) को शर्करा में तोड़ देता है।
- T = ट्रिप्सिन (Trypsin): यह प्रोटीन (पेप्टोन) को पचाकर पेप्टाइड में बदल देता है।
2. जेजुनम (Jejunum)
- जेजुनम में पाचन की कोई क्रिया नहीं होती है। ग्रहणी के बाद भोजन जेजुनम में जाता है और फिर इलियम में जाता है।
3. इलियम (Ileum)
- यह छोटी आंत का अंतिम भाग होता है। यहाँ से भोजन का पाचन तथा अवशोषण दोनों होता है।
- यहाँ से कई प्रकार के आंत रस (Intestinal Juice) निकलते हैं जिन्हें सक्कस इन्ट्रीकस (Succus entericus) कहते हैं।
- प्रमुख एंजाइम:
- इरेप्सिन (Erepsin): यह प्रोटीन को पचाता है (पेप्टाइड को Amino Acid में बदल देता है) और यहाँ प्रोटीन का पाचन पूर्ण हो जाता है।
- लाइपेज (Lipase): यह वसा का पाचन करता है (ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल में बदलता है)।
- माल्टेज (Maltase): यह माल्टोज को पचाता है।
- सुक्रेज (Sucrase): यह सुक्रोज (चीनी) को पचाता है।
- लैक्टेज (Lactase): यह लैक्टोज को पचाता है।
Note:
- छोटी आंत का अंतिम भाग इलियम में अंगुली जैसी रचना पायी जाती है जिसे विलाई (Villi) कहते हैं। विलाई अवशोषण करने का कार्य करता है।
- भोजन के तुरंत बाद अधिक जल नहीं पीना चाहिए क्योंकि यह एंजाइम को पतला कर देता है जिससे पाचन नहीं हो पाता है।
- छोटी आंत (इलियम) से भोजन निकलता है तो वह काईल (Chyle) का रूप ले लेता है और बड़ी आंत में प्रवेश कर जाता है।
बड़ी आंत (Large Intestine)
- बड़ी आंत में भोजन का पाचन नहीं होता है इसमें केवल जल अवशोषण होता है भोजन का नहीं। इसमें विटामिन B का भी निर्माण होता है।
- बड़ी आंत के भाग: (1) सीकम (Caecum) (2) कोलोन (Colon) (3) रेक्टम या मलाशय (Rectum)।
- सीकम (Caecum): छोटी आंत के बाद भोजन सीकम में प्रवेश करता है। सीकम के नीचे एपेन्डिक्स (Appendix) पाया जाता है जो हमारे शरीर में एक अवशेषी अंग है (यह सेल्यूलोज को पचाता है)।
- कोलोन (Colon): सीकम के बाद कोलोन प्रारंभ होता है। कोलोन में ही म्यूकस का निर्माण होता है, जो पचे भोजन को चिपचिपा बना देता है।
- मलाशय (Rectum): म्यूकस का निर्माण मलाशय में अवशिष्ट पदार्थ जमा करने में मदद करता है और मल त्याग को आसान बनाता है। अवशिष्ट पदार्थ गुदा के द्वारा बाहर निकल जाता है।
पाचन की प्रमुख अवस्थाएं
पाचन की क्रिया एक जल अपघटन की क्रिया है जो पांच अवस्थाओं में होती है:
- अंतर्ग्रहण (Ingestion): भोजन को निगलने की क्रिया को अंतःग्रहण कहते हैं।
- पाचन (Digestion): भोज्य पदार्थों का छोटे-छोटे सरल पदार्थों में टूटना पाचन कहलाता है।
- अवशोषण (Absorption): पचे भोजन पदार्थों को कोशिकाएं जब सोख लेती हैं तो उसे अवशोषण कहते हैं।
- स्वांगीकरण (Assimilation): पचे भोज्य पदार्थ से ऊर्जा प्राप्त करने की क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं।
- मल-परित्याग (Defecation): पाचन के बाद बचे हुए अवशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की क्रिया मल-परित्याग कहलाती है।
Remarks:
- Carbohydrate पचने के बाद Glucose में परिवर्तित होता है।
- Protein पचने के बाद Amino Acid में परिवर्तित होता है।
- Fat पचने के बाद Fatty Acid + Glycerol में परिवर्तित होता है।
- Vitamins, Minerals तथा Water ऊर्जा प्रदान नहीं करती है।
